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✨ Term 1 Hindi · Chapter 5

कबीर के दोहे

Eight timeless couplets by संत कबीरदास — simple words carrying centuries of wisdom about truth, the guru, kind speech, and good company.

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कवि परिचय (About the poet)

Hi, it's Patto! Kabir wove cloth on a loom AND wove poetry in his mind — and became one of the most quoted poets in Hindi history!
✨ संत कबीरदास

A saint who wove cloth on a handloom and poetry in his mind — becoming so famous that people still sing his verses like bhajans and study them in textbooks today. Kabir's birth is traditionally placed in the 14th century in Kashi (Varanasi) — exact dates are not certain, since he is a centuries-old figure. His works are collected mainly in the कबीर ग्रंथावली. His poetry still inspires us to understand life's truths and become better people.

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सभी 8 दोहे

दोहा 1साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।
दोहा 2बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
दोहा 3गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
दोहा 4अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
दोहा 5ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
दोहा 6निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।।
दोहा 7साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।
सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।।
दोहा 8कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।
जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।

— कबीर · संदर्भ: कबीर वचनावली (संपादक: अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध')

✨ हर दोहे का सरल अर्थ

1. सत्य से बड़ी कोई साधना नहीं, झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं — जिसके हृदय में सत्य है, वहाँ गुरु स्वयं वास करते हैं। 2. केवल ऊँचा होना काफी नहीं — खजूर का वृक्ष जितना ऊँचा हो, राहगीरों को छाया नहीं दे सकता, फल भी बहुत दूर होते हैं। 3. गुरु और गोविंद (ईश्वर) दोनों सामने खड़े हों तो पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ने ही ईश्वर तक पहुँचाया। 4. बोलने में, चुप रहने में, बारिश में, धूप में — हर बात में अति (ज्यादा) अच्छी नहीं होती, संतुलन जरूरी है। 5. ऐसी मीठी वाणी बोलनी चाहिए जो अपना अहंकार मिटाकर दूसरों को भी शांति दे और खुद को भी। 6. आलोचकों को पास रखना चाहिए — वे बिना पानी-साबुन के ही हमें निर्मल (शुद्ध) कर देते हैं. 7. सच्चा साधु सूप (अनाज छाननेवाला उपकरण) जैसा होना चाहिए — अच्छाई को पकड़कर रखे, बुराई को उड़ा दे। 8. मन एक पंछी जैसा है, जहाँ चाहे उड़ जाता है — जैसी संगति (साथ) करता है, वैसा ही फल पाता है।

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मेरी समझ से (Comprehension)

Try each one yourself first, then tap to check!

(ख) गुरु का महत्व

(ग) हर परिस्थिति में संतुलन होना आवश्यक है।

(ख) दूसरों के काम आना — केवल ऊँचा/बड़ा होना काफी नहीं, दूसरों को उपयोगी होना जरूरी है।

(ख) दूसरों और स्वयं को मानसिक शांति मिलती है — "औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।"

दोनों (ख) और (घ) सही भाव देते हैं, पर सबसे सटीक उत्तर है: (ख) सत्य का पालन करना किसी साधना से कम नहीं है।

(ग) आलोचकों को पास रखना चाहिए — वे हमें हमारी गलतियाँ बताकर सुधरने में मदद करते हैं।

(ग) विवेक और सूझबूझ का — सूप (अनाज छानने का उपकरण) अच्छे अनाज को रखता है और भूसे को उड़ा देता है, ठीक वैसे ही एक बुद्धिमान व्यक्ति अच्छाई-बुराई में फर्क करता है।

📝 (ख) group चर्चा

हो सकता है आपके समूह के साथियों ने ऊपर के सवालों के अलग-अलग सही उत्तर चुने हों (कुछ सवालों के एक से ज़्यादा सही उत्तर भी हो सकते हैं!)। अपने मित्रों से चर्चा करें कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने।

मिलकर करें मिलान (क) — पंक्ति का सरल अर्थ खोजिए

पाठ से चुनकर कुछ पंक्तियाँ स्तंभ 1 में दी गई हैं। इन्हें स्तंभ 2 में दिए गए इनके सही अर्थ या संदर्भ से मिलाइए।

स्तंभ 1 — दोहे की पंक्तिस्तंभ 2 — सरल अर्थ
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।गुरु शिष्य का मार्गदर्शन करते हैं और शिष्य गुरु का आदर करते हैं।
अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।जीवन में संतुलन महत्वपूर्ण है।
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।हमें मधुर वाणी बोलनी चाहिए जिससे मन को शांति प्राप्त हो सके।
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।आलोचकों को अपने पास रखना चाहिए। वे हमें हमारी गलतियाँ बताते हैं।
साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।विवेकशील व्यक्ति को अच्छे और बुरे की पहचान होती है।
कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।मन को नियंत्रित करना और सही दिशा में ले जाना महत्वपूर्ण है।
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।सत्य का पालन कठिन है और झूठ पाप के समान है।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।बड़ा होने के साथ व्यक्ति को उदार भी होना चाहिए।

मिलकर करें मिलान (ख) — पंक्ति को उसकी अगली पंक्ति से जोड़िए

पंक्ति की शुरुआतपूरी पंक्ति (दूसरी पंक्ति)
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय।औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।
निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।।
साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।।
कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय।जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।जाके हिरदे साँच है, ता हिरदे गुरु आप।।

पंक्तियों पर चर्चा

पाठ से चुनी इन पंक्तियों को ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए।

हमारा मन एक पंछी जैसा चंचल है — यह जहाँ चाहे वहाँ उड़ जाता है। हम जैसी संगति (साथ) चुनते हैं, हमारा स्वभाव और व्यवहार भी वैसा ही बन जाता है। इसलिए अच्छी संगति चुनना बहुत ज़रूरी है — जैसे संगत, वैसा रंग!

सत्य से बड़ी कोई तपस्या नहीं है और झूठ से बड़ा कोई पाप नहीं। जिसके हृदय में सच्चाई बसती है, वहाँ गुरु स्वयं निवास करते हैं — यानी सच बोलने वाला व्यक्ति ही सच में ज्ञानी और पवित्र माना जाता है।

सोच-विचार के लिए

पाठ को पुनः ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए।

यह एक खुला (open-ended) सवाल है — अपने विचार लिखिए। एक उदाहरण: हाँ, क्योंकि गुरु ही वह व्यक्ति हैं जिन्होंने हमें ईश्वर को पहचानने और सही राह दिखाने का रास्ता सिखाया, इसलिए कबीर उन्हें पहले नमन करते हैं।

केवल ऊँचा या संपन्न होना काफी नहीं है — व्यक्ति में दूसरों के काम आने का गुण, विनम्रता और उदारता भी होनी चाहिए, जैसे छायादार व फलदार पेड़ हर किसी के काम आते हैं।

दोहे की पंक्ति खुद कहती है — "औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय" — यानी मीठी वाणी दूसरों को भी शांत करती है और बोलने वाले को भी। उदाहरण: जब हम किसी को प्यार से समझाते हैं तो सुनने वाला शांत होता है और हमारा भी मन हल्का रहता है, जबकि गुस्से में बोलने पर दोनों का मन अशांत हो जाता है।

जिस तरह की संगति में हम रहते हैं, वैसे ही हमारे विचार, आदतें और व्यवहार बनते जाते हैं। उदाहरण: अच्छे और मेहनती दोस्तों की संगति में पढ़ाई की आदत बनती है, जबकि गलत संगति में पड़कर बच्चे पढ़ाई से दूर हो सकते हैं और बुरी आदतें अपना सकते हैं।

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दोहे की रचना, कल्पना और वाद-विवाद

Kabir's dohas aren't just wise — they're built with clever wordplay too! Let's spot the poetic tricks.

दोहे की रचना (poetic devices in the doha)

अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।

इन दोनों पंक्तियों के दो-दो भाग हैं, और चारों भागों का पहला शब्द है 'अति' — इससे एक विशेष प्रभाव बनता है। अपने समूह में मिलकर पाठ के दोहों में से नीचे बताई गई विशेषताओं वाली पंक्तियाँ ढूँढ़कर लिखिए:

"ति का भला न बोलना, ति का भला न चूप" और "ति का भला न बरसना, ति की भली न धूप" — दोनों पंक्तियों में 'अति' शब्द दो-दो बार आता है (अनुप्रास अलंकार)।

"सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय" (साधू ऐसा चाहिए दोहे में) — 'सार' शब्द एक साथ दो बार आया है।

"अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप" — या ध्यान दें कि दोहे में ही आगे 'चूप' शब्द सामान्य वर्तनी 'चुप' से एक मात्रा भर अलग लिखा गया है, जिससे तुक (rhyme) मिलती है।

"अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप" (बोलना ↔ चुप रहना) और "अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप" (बारिश ↔ धूप) — दोनों पंक्तियों में विपरीतार्थक भाव वाले शब्द-जोड़े हैं।

"साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय" — साधु की तुलना सूप (अनाज छानने के उपकरण) से की गई है (उपमा अलंकार)।

"कबिरा मन पंछी भया" — यहाँ मन को सीधे 'पंछी' कह दिया गया है (मन = पंछी), यह रूपक अलंकार का उदाहरण है।

"अति का भला न चूप" — सामान्य वर्तनी 'चुप' है, पर दोहे में 'चूप' (दीर्घ ऊ की मात्रा के साथ) लिखा है ताकि तुक और लय बनी रहे।

"बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागै अति दूर।।" — यहाँ खजूर के पेड़ के उदाहरण से यह बात समझाई गई है कि केवल बड़ा होना काफी नहीं है।

📝 (ख) साझा कीजिए

अपने समूह की सूची कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए — देखिए किसने कौन-सी नई पंक्तियाँ खोजीं!

अनुमान और कल्पना से (imagine & discuss — हर दोहे के साथ)

अपने समूह में मिलकर इन सवालों पर चर्चा कीजिए:

यह खुला सवाल है — अपने विचार लिखिए। उदाहरण: मैं भी पहले गुरु को प्रणाम करता, क्योंकि गुरु ने ही मुझे ईश्वर को पहचानना सिखाया। यदि दुनिया में कोई गुरु/शिक्षक न होता, तो हमें सही-गलत का ज्ञान, विषयों की समझ और जीवन-कौशल सीखने में बहुत कठिनाई होती।

बहुत अधिक बोलना दूसरों को परेशान करता है, बहुत चुप रहना गलतफहमी बढ़ा सकता है। ज्यादा या कम वर्षा से बाढ़ या सूखा जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। ज़रूरत से ज्यादा मोबाइल/मल्टीमीडिया प्रयोग से आँखों को नुकसान, पढ़ाई में मन न लगना और नींद कम होना जैसी समस्याएँ हो सकती हैं — हर जगह संतुलन ज़रूरी है।

झूठ बोलने से लोगों का भरोसा टूट जाता है और बाद में उसे संभालना मुश्किल होता है। सही जवाब: मैं शिक्षक को सच बता दूँगा/दूँगी कि उत्तर गलत था, क्योंकि ईमानदारी सबसे ज़रूरी है — यही "साँच बराबर तप नहीं" का संदेश है।

यदि सभी मीठी वाणी बोलें तो झगड़े कम होंगे और लोगों के बीच प्यार व शांति बढ़ेगी। कभी-कभी किसी को खतरे से सख्ती से चेतावनी देना ज़रूरी हो सकता है (जैसे किसी को आग या गाड़ी से बचाने के लिए ज़ोर से चिल्लाना) — पर वह भी दूसरे की भलाई के लिए ही होना चाहिए।

मैं समझाऊँगा/समझाऊँगी कि सिर्फ बड़ा या संपन्न होना काफी नहीं, दूसरों के काम आना ज़्यादा ज़रूरी है। खजूर/नारियल के फल, लकड़ी, पत्ते सब उपयोगी होते हैं — भले ही छाया न दें। कक्षा मॉनीटर चुनते समय ज़िम्मेदारी, सबकी मदद करने का स्वभाव, और अनुशासन जैसे गुण देखूँगा/देखूँगी।

गलतियाँ बताने वाला व्यक्ति हमें सुधरने और बेहतर बनने में मदद करता है। यदि कोई किसी की गलतियाँ न बताए, तो लोग अपनी कमियों से अनजान रहेंगे और सुधार नहीं कर पाएँगे — समाज में गलत आदतें बढ़ती रहेंगी।

'सूप' जैसी विवेकशीलता होने पर मैं सही और गलत बातों में फर्क कर पाऊँगा/पाऊँगी और अच्छी बातें ही अपनाऊँगा/अपनाऊँगी। बिना सोचे-समझे हर बात मान लेने से हम गलत रास्ते पर जा सकते हैं और नुकसान उठा सकते हैं — इसलिए हर जानकारी को परखना ज़रूरी है।

यह खुला सवाल है — जैसे, मैं अपने मन को किताबों की दुनिया या प्रकृति के बीच ले जाना चाहूँगा/चाहूँगी क्योंकि वहाँ शांति मिलती है। संगति का असर बहुत गहरा पड़ता है — अच्छी संगति अच्छी आदतें और सोच देती है, बुरी संगति बुरी आदतें और गलत रास्ते की ओर ले जा सकती है।

वाद-विवाद (debate)

अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप।
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।
🎤 कक्षा गतिविधि

इस दोहे का आज के समय में क्या महत्व है? इसके बारे में कक्षा में एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए — एक समूह पक्ष में विचार प्रस्तुत करेगा, दूसरा समूह विपक्ष में बोलेगा, और एक तीसरा समूह निर्णायक बन सकता है।

उदाहरण तर्क:
पक्ष — वाणी पर संयम रखना आवश्यक है।
विपक्ष — अत्यधिक चुप रहना भी उचित नहीं है।
(ग) पक्ष और विपक्ष में प्रस्तुत तर्कों की सूची अपनी लेखन-पुस्तिका में लिख लीजिए।

शब्द से जुड़े शब्द (word web)

नीचे दिए गए खाली बक्सों में कबीर से जुड़े शब्द पाठ में से चुनकर लिखिए और अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए। एक उदाहरण दिया गया है — बानी

🕸️ कबीर — शब्द जाल

केंद्र में शब्द है "कबीर"। इसके चारों ओर 6 खाली बक्से हैं (एक में उदाहरण के तौर पर बानी भरा है) — बाकी 5 में पाठ से कबीर से जुड़े शब्द चुनकर भरने हैं। कुछ संभावित उत्तर: बानी (दिया गया उदाहरण), गुरु, साँच, दोहा, संगति, निंदक, साधू — पाठ में से ऐसे और शब्द ढूँढ़िए जो कबीर के विचारों या जीवन से जुड़े हों!

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दोहे और कहावतें

💡 "जैसा संग वैसा रंग"

दोहा 8 की पंक्ति "जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय" से बनी एक बहुत प्रसिद्ध कहावत है — "जैसा संग वैसा रंग": व्यक्ति जिस संगति में रहता है, वैसा ही उसका व्यवहार और स्वभाव बन जाता है।

आज के समय में — कौन-सा दोहा किस स्थिति में लागू होता है?

"कबिरा मन पंछी भया, भावै तहवाँ जाय। जो जैसी संगति करै, सो तैसा फल पाय।।"

"साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।।"

"निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करै सुभाय।।"

"ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को सीतल करै, आपहुँ सीतल होय।।"

"अति का भला न बोलना, अति का भला न चूप। अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।।"

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।"

✍️ आपकी बारी — नई कहावतें बनाइए

इस पाठ में हमने देखा कि कैसे एक दोहे की पंक्ति से पूरी एक कहावत बन गई। अब आप भी ऐसी अन्य कहावतों (जैसे "अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत", "नेकी कर दरिया में डाल", "जैसी करनी वैसी भरनी") का प्रयोग करते हुए अपने मन से कुछ वाक्य बनाकर लिखिए।

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प्रस्तुति, अपनी बात और सृजन

Now let's take the dohas beyond the page — perform them, talk about your own life, and write something new!

सबकी प्रस्तुति (present it your way)

पाठ के किसी एक दोहे को चुनकर अपने समूह के साथ मिलकर भिन्न-भिन्न प्रकार से कक्षा के सामने प्रस्तुत कीजिए। उदाहरण के लिए —

🎭 प्रस्तुति के तरीके

• गायन करना, जैसे लोकगीत शैली में।
• भाव-नृत्य प्रस्तुति।
• कविता पाठ करना।
• संगीत के साथ प्रस्तुत करना।
• अभिनय करना — जैसे एक दोस्त गुस्से में आकर कुछ गलत कह देता है, लेकिन दूसरा दोस्त उसे समझाता है कि मधुर भाषा का कितना प्रभाव पड़ता है (दोहा 5 — "ऐसी बानी बोलिए, मन का आपा खोय")।

आपकी बात (personal reflection)

यह एक व्यक्तिगत सवाल है — अपने अनुभव के बारे में लिखिए (माता-पिता, शिक्षक, बड़े भाई-बहन या कोई और गुरु-समान व्यक्ति हो सकते हैं जिन्होंने सही राह दिखाई)।

अपना अनुभव साझा कीजिए — जैसे किसी दोस्त या शिक्षक ने आपकी किसी आदत या गलती के बारे में बताया हो, और उस बात को सुनकर आपने कैसे सुधार किया।

अपना अनुभव साझा कीजिए — जैसे अच्छे दोस्तों की संगति में पढ़ाई की आदत, अनुशासन या खेल में रुचि कैसे बढ़ी, या किसी संगति से कोई नई अच्छी/बुरी आदत कैसे लगी।

सृजन (creative writing)

✏️ सृजन (क) — कहानी लिखिए

"साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।" इस दोहे पर आधारित एक कहानी लिखिए जिसमें किसी व्यक्ति ने कठिन परिस्थितियों में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। संकेत: किसी खेल में आपकी टीम द्वारा नियमों के उल्लंघन का आपके द्वारा विरोध किया जाना।

✏️ सृजन (ख) — साक्षात्कार व निबंध

"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागौं पाँय।" इस दोहे को ध्यान में रखते हुए अपने किसी प्रेरणादायक शिक्षक से साक्षात्कार कीजिए और उनके योगदान पर एक निबंध लिखिए।

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कबीर हमारे समय में और साइबर सुरक्षा

कबीर हमारे समय में

कुछ संभावित विषय: सोशल मीडिया का सही उपयोग, प्रदूषण और पर्यावरण की रक्षा, इंटरनेट पर फैलती झूठी खबरें (fake news), बढ़ती नफ़रत/भेदभाव के खिलाफ प्रेम-भाईचारा, और आज भी सच्चाई व अच्छी संगति का महत्व।

यह एक रचनात्मक (creative) सवाल है — अपने मन से दो पंक्तियाँ लिखिए। उदाहरण के तौर पर: "मोबाइल का अति न भावे, ज्ञान न सोशल मीडिया लावे। जितना पढ़ो उतना गुण पावे, संतुलन से जीवन सुख पावे।"

साइबर सुरक्षा और दोहे

अपना पता, स्कूल, फोन नंबर या तस्वीरें अनजान लोगों से साझा करने पर कोई हमें नुकसान पहुँचा सकता है, धोखा दे सकता है, या हमारी निजता (privacy) खतरे में पड़ सकती है — यहाँ भी 'अति' (ज़रूरत से ज़्यादा शेयर करना) नुकसानदायक है, इसलिए संतुलन ज़रूरी है।

इंटरनेट पर सही और गलत, दोनों तरह की जानकारी मिलती है — जैसे सूप अच्छे अनाज को रखता है और भूसे को उड़ा देता है, वैसे ही हमें भी सही स्रोत (जैसे भरोसेमंद वेबसाइट, शिक्षक, किताबें) से आई जानकारी को अपनाना चाहिए और भ्रामक/असत्यापित (unverified) जानकारी को छोड़ देना चाहिए — किसी भी बात पर आँख मूँदकर भरोसा नहीं करना चाहिए।

खोजबीन के लिए (explore further)

🔍 भजन खोजिए

अपने परिजनों, मित्रों, शिक्षकों, पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता से कबीर के भजनों, गीतों, लोकगीतों को खोजिए और सुनिए। किसी एक गीत को अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए। कक्षा के सभी समूहों द्वारा एकत्रित गीतों को जोड़कर एक पुस्तिका बनाइए और कक्षा के पुस्तकालय में उसे सम्मिलित कीजिए।

🎬 NCERT के वीडियो

कबीर के बारे में और जानने-समझने के लिए NCERT Official के YouTube चैनल पर उपलब्ध ये वीडियो देखे जा सकते हैं (शिक्षक/अभिभावक की सहायता से):
• संत कबीर
• कबीर वाणी (कई भाग)
• कबीर की साखियाँ
• दोहे कबीर, रहीम, तुलसी

8

कदम मिलाकर चलना होगा

A bonus poem by former PM अटल बिहारी वाजपेयी, about facing life's storms together with courage! This is the full poem — all 5 stanzas.
बाधाएँ आती हैं आएँ,
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पाँवों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों से हँसते-हँसते,
आग लगा कर जलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।
हास्य-रुदन में, तूफानों में,
अमर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा!
कदम मिलाकर चलना होगा।
उजियारे में, अंधकार में,
कल कछार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को दलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।
सम्मुख फैला अमर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अथ,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न माँगते,
पावस बनकर ढलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।
कुश काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुवन,
पर-हित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
कदम मिलाकर चलना होगा।

— अटल बिहारी वाजपेयी (भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं प्रसिद्ध कवि और लेखक)

✨ What this poem means

No matter what obstacles come — fire beneath our feet, flames above our heads, laughter or tears, honour or insult, victory or defeat — we must smile and face them, walking forward together, step in step. Every stanza ends with the same powerful refrain: "कदम मिलाकर चलना होगा" (we must walk forward, keeping step together). It's a poem about facing life's hardest storms with courage, sacrifice, and unity — never giving up, no matter what comes our way.

9

Practice like the real exam

Cover the answer, try it yourself first, then tap to check!

MCQ style (1 mark each)

(ख) कबिरा मन पंछी भया

Short answer (2 marks)

क्योंकि आलोचक हमें हमारी गलतियाँ बताते हैं, और उनकी बात सुनकर हम बिना पानी-साबुन के भी अपने स्वभाव को शुद्ध कर सकते हैं।

Longer answer (3-4 marks)

इस दोहे में कबीर कहते हैं कि हर बात में संतुलन जरूरी है — न बहुत बोलना अच्छा है, न बिलकुल चुप रहना। आज के समय में भी यह बात सोशल मीडिया पर बहुत ज्यादा या बहुत कम बोलने, काम और आराम के बीच संतुलन रखने, और हर परिस्थिति में अति (extreme) से बचने के लिए लागू होती है। संतुलित जीवन ही सुखी जीवन है।

10

You did it! 🎉

Chapter 5 done! You know all 8 of Kabir's timeless dohas, all their exercises, plus the full 5-stanza bonus poem by Vajpayee. ⭐
8 दोहे 1 कहावत Bonus: Vajpayee poem (5 stanzas) Real-life applications

🏁 Chapter 5 · Term 1 Hindi · Prishita, Class 8