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✨ Term 1 Hindi · Chapter 2

दो गौरैया

A funny, heartwarming story by भीष्म साहनी about two little sparrows who move into a family's ceiling fan — and win everyone's hearts.

1

लेखक परिचय (About the author)

Hi, it's Patto! This lovely family comedy was written by a very famous, award-winning Hindi author.
✨ भीष्म साहनी (1915–2003)

A versatile writer of Hindi literature who movingly wrote about India's Partition and human values in his stories. He received the Sahitya Akademi Award for his famous novel तमस. The Government of India honored his contribution to literature with the Padma Bhushan. For children, he wrote several stories including "गुलेल का खेल."

2

कहानी (The story)

घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं — माँ, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं।

आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहाँ कभी तोते पहुँच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैयाँ। वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!

घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं। रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते फिरते हैं। वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं। एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है। उसे शायद गरमी बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झाँक जाती है। मन आया तो अंदर आकर दूध पी गई, न मन आया तो बाहर से ही 'फिर आऊँगी' कहकर चली जाती है। शाम पड़ते ही दो-तीन चमगादड़ कमरों के आर-पार पर फैलाए कसरत करने लगते हैं। घर में कबूतर भी हैं। दिन-भर 'गुटर-गूँ गुटर-गूँ' का संगीत सुनाई देता रहता है। इतने पर ही बस नहीं, घर में छिपकलियाँ भी हैं और बर्रे भी हैं और चींटियों की तो जैसे फौज ही छावनी डाले हुए है।

अब एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं। पिताजी कहने लगे कि मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं। कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर। फिर जैसे आई थीं वैसे ही उड़ भी गईं। पर दो दिन बाद हमने क्या देखा कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना बिछावन बिछा लिया है और सामान भी ले आई हैं और मजे से दोनों बैठी गाना गा रही हैं। जाहिर है, उन्हें घर पसंद आ गया था।

माँ और पिताजी दोनों सोफे पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे। थोड़ी देर बाद माँ सिर हिलाकर बोलीं, "अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।"

इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले, "देखता हूँ ये कैसे यहाँ रहती हैं! गौरैयाँ मेरे आगे क्या चीज हैं! मैं अभी निकाल बाहर करता हूँ।"

"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" माँ ने व्यंग्य से कहा।

माँ कोई बात व्यंग्य में कहें, तो पिताजी उबल पड़ते हैं, वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही है। वह फौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाई और मुँह से 'श...शू' कहा, बाँहें झुलाईं, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे, कभी बाँहें झुलाते, कभी 'श...शू' करते।

गौरैयों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झाँककर देखा और दोनों एक साथ 'चीं-चीं' करने लगीं। और माँ खिलखिलाकर हँसने लगीं।

पिताजी को गुस्सा आ गया, "इसमें हँसने की क्या बात है?"

माँ को ऐसे मौकों पर हमेशा मजाक सूझता है। हँसकर बोली, "चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?"

तब पिताजी को और भी ज्यादा गुस्सा आ गया और वह पहले से भी ज्यादा ऊँचा कूदने लगे।

गौरैयाँ घोंसले में से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं। उन्हें पिताजी का नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था। माँ फिर हँसने लगीं, "ये निकलेंगी नहीं, जी। अब इन्होंने अंडे दे दिए होंगे।"

"निकलेंगी कैसे नहीं?" पिताजी बोले और बाहर से लाठी उठा लाए। इसी बीच गौरैयाँ फिर घोंसले में जा बैठी थीं। उन्होंने लाठी ऊँची उठाकर पंखे के गोले को ठकोरा। 'चीं-चीं' करती गौरैयाँ उड़कर पर्दे के डंडे पर जा बैठीं।

"इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत थी। पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं।" माँ ने हँसकर कहा।

पिताजी लाठी उठाए पर्दे के डंडे की ओर लपके। एक गौरैया उड़कर किचन के दरवाजे पर जा बैठी। दूसरी सीढ़ियों वाले दरवाजे पर।

माँ फिर हँस दी। "तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो। एक दरवाजा खुला छोड़ो, बाकी दरवाजे बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।"

अब पिताजी ने मुझे झिड़ककर कहा, "तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोनों दरवाजे बंद कर दे!"

मैंने भागकर दोनों दरवाजे बंद कर दिए केवल किचन वाला दरवाजा खुला रहा।

पिताजी ने फिर लाठी उठाई और गौरैयों पर हमला बोल दिया। एक बार तो झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते-लगते बची। चीं-चीं करती चिड़ियाँ कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह जा बैठतीं। आखिर दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाजे में से बाहर निकल गईं। माँ तालियाँ बजाने लगीं। पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे।

"आज दरवाजे बंद रखो" उन्होंने हुक्म दिया। "एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।"

तभी पंखे के ऊपर से चीं-चीं की आवाज सुनाई पड़ी। और माँ खिलखिलाकर हँस दी। मैंने सिर उठाकर ऊपर की ओर देखा, दोनों गौरैयाँ फिर से अपने घोंसले में मौजूद थीं।

"दरवाजे के नीचे से आ गई हैं," माँ बोलीं।

मैंने दरवाजे के नीचे देखा। सचमुच दरवाजों के नीचे थोड़ी-थोड़ी जगह खाली थी।

पिताजी को फिर गुस्सा आ गया। माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं।

अब तो पिताजी गौरैयों पर पिल पड़े। उन्होंने दरवाजों के नीचे कपड़े ठूँस दिए ताकि कहीं कोई छेद बचा नहीं रह जाए। और फिर लाठी झुलाते हुए उन पर टूट पड़े। चिड़ियाँ चीं-चीं करती फिर बाहर निकल गईं। पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर कमरे में मौजूद थीं। अबकी बार वे रोशनदान में से आ गई थीं जिसका एक शीशा टूटा हुआ था।

"देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो," माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा, "अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी।"

"क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूँ?" पिताजी बोले और कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा ठूँस दिया और फिर लाठी झुलाकर एक बार फिर चिड़ियों को खदेड़ दिया। दोनों पिछले आँगन की दीवार पर जा बैठीं।

इतने में रात पड़ गई। हम खाना खाकर ऊपर जाकर सो गए। जाने से पहले मैंने आँगन में झाँककर देखा, चिड़ियाँ वहाँ पर नहीं थीं। मैंने समझ लिया कि उन्हें अक्ल आ गई होगी। अपनी हार मानकर किसी दूसरी जगह चली गई होंगी।

दूसरे दिन इतवार था। जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं। पिताजी ने फिर लाठी उठा ली। उस दिन उन्हें गौरैयों को बाहर निकालने में बहुत देर नहीं लगी।

अब तो रोज यही कुछ होने लगा। दिन में तो वे बाहर निकाल दी जातीं पर रात के वक्त जब हम सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आतीं।

पिताजी परेशान हो उठे। आखिर कोई कहाँ तक लाठी झुला सकता है? पिताजी बार-बार कहें, "मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।" पर आखिर वह भी तंग आ गए थे। आखिर जब उनकी सहनशीलता चुक गई तो वह कहने लगे कि वह गौरैयों का घोंसला नोचकर निकाल देंगे। और वह फौरन ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए।

घोंसला तोड़ना कठिन काम नहीं था। उन्होंने पंखे के नीचे फर्श पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए। "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए," उन्होंने गुस्से से कहा।

घोंसले में से अनेक तिनके बाहर की ओर लटक रहे थे, गौरैयों ने सजावट के लिए मानो झालर टाँग रखी हो। पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकों पर जमाया और दाईं ओर को खींचा। दो तिनके घोंसले में से अलग हो गए और फरफराते हुए नीचे उतरने लगे।

"चलो, दो तिनके तो निकल गए" माँ हँसकर बोलीं, "अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे!"

तभी मैंने बाहर आँगन की ओर देखा और मुझे दोनों गौरैयाँ नजर आईं। दोनों चुपचाप दीवार पर बैठी थीं। इस बीच दोनों कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं।

अब पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनकों के ऊपर रखकर वहीं रखे-रखे घुमाने लगे। इससे घोंसले के लंबे-लंबे तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे। वे लिपटते गए, लिपटते गए और घोंसला लाठी के इर्द-गिर्द खिंचता चला आने लगा। फिर वह खींच-खींचकर लाठी के सिरे के इर्द-गिर्द लपेटा जाने लगा। सूखी घास और रुई के फाहे और धागे और थिगलियाँ लाठी के सिरे पर लिपटने लगीं। तभी सहसा जोर की आवाज आई, "चीं-चीं, चीं-चीं!!!"

पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरैयाँ लौट आई हैं? मैंने झट से बाहर की ओर देखा। नहीं, दोनों गौरैयाँ बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं।

"चीं-चीं, चीं-चीं!" फिर आवाज आई। मैंने ऊपर देखा। पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं। अभी भी पिताजी के हाथ में लाठी थी और उस पर लिपटा घोंसले का बहुत-सा हिस्सा था। नन्हीं-नन्हीं दो गौरैयाँ! वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं। हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?

मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा। फिर मैंने देखा, पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं। और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दी है और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए हैं। इस बीच माँ कुर्सी पर से उठीं और सभी दरवाजे खोल दिए। नन्हीं चिड़ियाँ अभी भी हाँफ-हाँफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने माँ-बाप को बुला रही थीं।

उनके माँ-बाप झट-से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे। माँ-पिताजी और मैं उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।

— भीष्म साहनी

✨ The heart of the story

Two sparrows keep coming back despite the father's endless (and often funny) attempts to evict them. Just when he tries to break their nest for good, baby sparrows suddenly appear, crying for their parents — and the father's heart melts. By the end, the noisy little family is simply... accepted, with a smile.

3

मेरी समझ से (Comprehension)

These are the official textbook questions. Try each one yourself first, then tap to check!

मेरी समझ से (क) — सही उत्तर पर तारा (★) बनाइए (कुछ सवालों के एक से अधिक सही उत्तर हो सकते हैं)

  • घर की बनावट सराय जैसी बहुत विशाल है
  • ★ घर में विभिन्न पक्षी और जीव-जंतु रहते हैं
  • ★ पिताजी और माँ घर के मालिक नहीं हैं
  • ★ घर में विभिन्न जीव-जंतु आते-जाते रहते हैं

यह एक बहु-उत्तर प्रश्न है — तीन विकल्पों पर तारा लगेगा।

  • माँ और पिताजी को जिनका वह मकान है
  • लेखक को जिसने यह कहानी लिखी है
  • ★ जीव-जंतुओं को जो उस घर में रहते थे
  • मेहमानों को जो लेखक से मिलने आते थे
  • दोनों ने खुशी से घर में उनका स्वागत किया
  • ★ पिताजी ने उन्हें भगाने की कोशिश की लेकिन माँ ने मना किया
  • दोनों ने मिलकर उन्हें घर से बाहर निकाल दिया
  • माँ ने उन्हें निकालने के लिए कहा लेकिन पिताजी ने घर में रहने दिया
  • ★ माँ चाहती थीं कि गौरैयाँ घर से भगाई न जाएँ
  • माँ को पिताजी के प्रयत्न व्यर्थ लगते थे
  • ★ माँ को गौरैयों की गतिविधियों पर हँसी आ जाती थी
  • माँ को दूसरों पर हँसना और उपहास करना अच्छा लगता था

यह बहु-उत्तर प्रश्न है — पहला और तीसरा विकल्प सबसे उपयुक्त हैं (दूसरा विकल्प भी आंशिक रूप से सही लग सकता है, इस पर कक्षा में चर्चा करें)।

  • दूसरों पर निर्भर रहना
  • असफलताओं से हार मान लेना
  • ★ अपने प्रयास को निरंतर जारी रखना
  • संघर्ष को छोड़कर नए रास्ते अपनाना
मेरी समझ से (ख)

हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने ऊपर के सवालों में अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ विचार कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने — किसी एक सवाल पर आपस में चर्चा करके देखिए!

मिलकर करें मिलान

पाठ में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। हर वाक्य के सामने दो अर्थ दिए गए हैं — पहले खुद पढ़कर सोचिए कि कौन-सा अर्थ सही है, फिर अपने समूह में चर्चा करके सबसे उपयुक्त अर्थ से मिलाइए (सही अर्थ पर है)।

क्रमवाक्यअर्थ — दो विकल्पों में से सही चुनिए
1वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!पक्षियों का शोर बहुत तेज होता है, लेकिन लोग उसे संगीत की तरह सराहते हैं। ★
✗ पिताजी को पक्षियों का चहकना शोर जैसा लगता था लेकिन लोगों को वह संगीत जैसा लगता था — यह गलत है क्योंकि यहाँ बात 'पिताजी' की नहीं, आम लोगों की हो रही है।
2आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं।आम के पेड़ पर अलग-अलग प्रकार के पक्षी हर समय निवास करते हैं। ★
✗ पक्षी पेड़ पर तंबू लगाकर रहते हैं जैसे किसी मेले में डेरा डाला जाता है — यह गलत है, यहाँ 'डेरा डालना' मुहावरा है जिसका अर्थ है 'रहना/डेरा जमाना', असली तंबू नहीं।
3वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते।चूहों की भागदौड़ और शोर इतना होता है कि घर के लोग चैन से सो नहीं पाते। ★
✗ पिताजी की भागदौड़ और शोर इतना होता है कि घर के चूहे चैन से सो नहीं पाते — यह गलत है, वाक्य में कर्ता और कर्म उलट दिए गए हैं (असल में शोर चूहे मचाते हैं, इंसान परेशान होते हैं)।
4वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं।पिताजी को ऐसा भ्रम होने लगता है कि माँ उनकी चेष्टाओं का उपहास कर रही हैं। ★
✗ पिताजी माँ का मजाक समझ जाते हैं — यह गलत है, पाठ के अनुसार माँ मजाक नहीं कर रही थीं, पिताजी को केवल ऐसा भ्रम (गलतफहमी) हो रहा था।
5पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे।पिताजी ने लाठी एक ओर रख दी और गर्व से, विजयी मुद्रा में बैठ गए। ★
✗ पिताजी की छाती और साँस फूलने लगी और उन्होंने लाठी एक ओर रख दी — यह गलत है, 'छाती फैलाना' का अर्थ यहाँ थकान से हाँफना नहीं बल्कि गर्व/जीत की मुद्रा है।
6इतने में रात पड़ गई।कहानी की घटनाओं के बीच धीरे-धीरे रात हो गई और अँधेरा छा गया। ★
✗ रात किसी भारी चीज की तरह ऊपर से गिर पड़ी — यह गलत है, 'रात पड़ना' का अर्थ केवल 'रात हो जाना' है, कुछ गिरना नहीं।
7जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं।गौरैयाँ फिर से लौट आई थीं और शांत व प्रसन्न भाव से चहचहा रही थीं जैसे कोई राग गा रही हों। ★
✗ गौरैयाँ शास्त्रीय संगीत का अभ्यास कर रही थीं और 'राग मल्हार' गा रही थीं — यह गलत है, यह एक रूपक (मुहावरे जैसा प्रयोग) है, गौरैयाँ असल में राग नहीं गातीं।

पंक्तियों पर चर्चा

पाठ से चुनी गई इन पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए और सोचिए — इनका क्या अर्थ समझ में आया?

माँ यह कह रही हैं कि अब बहुत देर हो चुकी है — शुरू में गौरैयों को भगाना आसान होता, पर अब जब उन्होंने घर (घोंसला) बना ही लिया है, तो उन्हें निकालना आसान नहीं होगा। यह किसी भी काम को सही समय पर करने के महत्व की ओर इशारा करता है।

पिताजी को उम्मीद थी कि अगर एक दिन गौरैयाँ घर के अंदर नहीं आ पाईं, तो वे हार मानकर हमेशा के लिए चली जाएँगी। लेकिन असल में गौरैयाँ बहुत दृढ़ निकलीं और दरवाजे के नीचे की खाली जगह से भी अंदर आ गईं — यानी पिताजी का अनुमान गलत साबित हुआ।

पिताजी गुस्से में गौरैयों का घोंसला ही तोड़ने का फैसला कर लेते हैं, यह सोचकर कि इसके बिना वे कहीं और नहीं जा सकतीं। यह पंक्ति पिताजी की झुँझलाहट और हार न मानने की जिद दोनों दिखाती है — पर आगे चलकर यही कठोर कदम उन्हें बच्चा-गौरैयों को देखने पर पछतावे और नरमी की ओर ले जाता है।

अतिरिक्त अभ्यास (Bonus practice Q&A)

जीव-जंतुओं को — घर में रहने वाले चूहे, चिड़िया, बिल्ली आदि — "हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं" पंक्ति से स्पष्ट है।

पिताजी ने उन्हें भगाने की बार-बार कोशिश की, लेकिन माँ ने हमेशा मना किया और उनका मजाक भी उड़ाया।

अपने प्रयास को निरंतर जारी रखना — बार-बार भगाए जाने पर भी हार न मानना।

बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में — संभवतः क्योंकि वह ऊँची, सुरक्षित जगह थी।

दृढ़ता, हार न मानने की प्रवृत्ति, आत्मविश्वास — साथ ही थोड़ी हठधर्मिता (जिद) भी झलकती है।

दरवाजे के नीचे की खाली जगह से, और टूटे शीशे वाले रोशनदान से।

लेखक का बेटा ("मैं") — प्रथम पुरुष में, जो माँ-पिताजी को अपने माता-पिता कहकर संबोधित करता है।

घोंसला तोड़े जाने के दौरान अचानक दो नन्हे बच्चा-गौरैयों को देखकर, क्योंकि किसी को अंदाजा नहीं था कि अंडों से बच्चे निकल चुके थे।

4

भाषा की बात (Grammar)

💡 क्रिया विशेषण (Adverbs)

"माँ खिलखिलाकर हँस दीं।" यहाँ 'खिलखिलाकर' बताता है कि माँ कैसे हँसी थीं। कोई कार्य कैसे किया गया है, यह बताने वाले शब्द 'क्रिया विशेषण' कहलाते हैं।

वाक्यक्रिया विशेषण
पिताजी ने झिड़ककर कहा, "तू खड़ा क्या देख रहा है?"झिड़ककर
"देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो", माँ ने गंभीरता से कहा।गंभीरता से
"...उसका घर तोड़ देना चाहिए", उन्होंने गुस्से में कहा।गुस्से में
TRY IT YOURSELF

इन और क्रिया विशेषण शब्दों का उपयोग करके अपने वाक्य बनाइए: धीरे से, जोर से, अटकते हुए, चिल्लाकर, शरमाकर, सहमकर, फुसफुसाते हुए।

💡 हेर-फेर मात्रा का

एक मात्रा-भर के अंतर से शब्द का अर्थ बदल जाता है! जैसे "देखे जा रहे थे" vs "उड़ जातीं" — मात्रा में हेरफेर से अर्थ बदलता है।

TRY IT YOURSELF

इन शब्द-जोड़ों के अर्थ का अंतर समझकर वाक्य बनाइए: नाच-नाचा-नचा, हार-हरा-हारा, पिता-पीता, चूक-चुक, नीचा-नीचे, सहसा-साहस।

5

पाठ से आगे की गतिविधियाँ (Beyond-the-text activities)

These are all the official NCERT activity-boxes from the textbook — thinking, imagining, acting, writing, and observing. Do as many as you can with family or friends!

सोच-विचार के लिए

पाठ को फिर से ध्यान से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए।

यह एक खुला (open-ended) प्रश्न है — अपने विचार लिखिए! उदाहरण के लिए: मुझे 'माँ' का पात्र सबसे अच्छा लगा, क्योंकि वह गौरैयों के प्रति दयालु थीं और हमेशा हँसकर स्थिति को हल्का बना देती थीं।

बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में। शायद इसलिए क्योंकि वह जगह ऊँची, सुरक्षित और शिकारियों से बचाव वाली थी — साथ ही घर के अंदर होने के कारण मौसम से भी सुरक्षित थी।

हाँ। गौरैयाँ बार-बार भगाए जाने पर भी लौट आती हैं और अपना घोंसला बचाने की कोशिश करती हैं। बच्चा-गौरैयाँ चीं-चीं करके अपने माँ-बाप को पुकारती हैं, और माँ-बाप तुरंत उड़कर उनके पास आ जाते हैं — यह दिखाता है कि पक्षी भी परिवार और घर से गहरा लगाव रखते हैं।

दृढ़ता, हार न मानने की प्रवृत्ति, आत्मविश्वास — साथ ही थोड़ी हठधर्मिता (जिद) भी झलकती है।

शुरू में गौरैयाँ मजे से गाना गाती और चहचहाती थीं। पर जब पिताजी बार-बार लाठी लेकर उन्हें भगाने लगे और आखिर में घोंसला ही तोड़ने लगे, तो गौरैयाँ दुबली और काली पड़ गईं, चुपचाप दीवार पर बैठी रहने लगीं और चहकना भी बंद कर दिया — डर और तकलीफ की वजह से यह बदलाव आया।

1. दरवाजों के नीचे की खाली जगह से  2. रोशनदान से (जिसका एक शीशा टूटा हुआ था)

लेखक का बेटा ("मैं") — प्रथम पुरुष ("मैं", "हमारे") में लिखी होने से और माँ-पिताजी को अपने माता-पिता कहकर संबोधित करने से यह पता चलता है।

माँ को शायद अंदाजा था कि गौरैयों ने अंडे दे दिए हैं और अपना घर (घोंसला) बना लिया है, इसलिए वे इतनी आसानी से हार मानकर हमेशा के लिए नहीं जाएँगी — एक माँ होने के नाते वे शायद गौरैयों की ममता को भी समझती थीं।

अनुमान और कल्पना से

यह भी एक खुला प्रश्न है — अपनी कल्पना से लिखिए! जैसे: मैं उन्हें देखकर खुश होता/होती और उनके लिए पानी और अनाज के दाने रख देता/देती।

यह भी आपकी कल्पना पर निर्भर है! उदाहरण: अगर 'कॉकरोच' घर में घुस आता, तो शायद घर के लोग गौरैयों जैसे धैर्य से पेश नहीं आते — बल्कि तुरंत झाड़ू या कीटनाशक से उसे भगाने की कोशिश करते, क्योंकि कॉकरोच को आमतौर पर गंदगी और बीमारी से जोड़ा जाता है, चिड़ियों जैसा प्यारा नहीं समझा जाता।

घोंसला तोड़े जाने के दौरान अचानक दो नन्हे बच्चा-गौरैयों को चीं-चीं करते देखकर, क्योंकि किसी को अंदाजा नहीं था कि अंडों से बच्चे निकल चुके थे।

शायद माँ को गौरैयों से कोई परेशानी ही नहीं थी और वे नहीं चाहती थीं कि उन्हें भगाया जाए — इसलिए वे मदद करने की बजाय पिताजी की कोशिशों पर हँसती रहीं।

यह एक खुला प्रश्न है — संकेत: आपको उसके व्यवहार पर ध्यान देना है, उसके रंग-रूप या वेशभूषा पर नहीं। जैसे: हमारा पड़ोसी कुत्ता दरवाजे की घंटी बजते ही पूँछ हिलाने लगता है — शायद वह जानता है कि कोई परिचित आ रहा है।

सराय एक ऐसी जगह होती है जहाँ अलग-अलग यात्री आते-जाते रहते हैं और कुछ समय के लिए रुकते हैं, जबकि घर में एक ही परिवार स्थायी रूप से रहता है। पिताजी का मतलब है कि उनके घर में भी अलग-अलग जीव-जंतु आते-जाते रहते हैं जैसे किसी सराय में मेहमान आते हैं — घर पर उनका अपना 'एकाधिकार' नहीं रहा।

संवाद और अभिनय

नीचे दी गई स्थितियों के लिए अपने समूह में मिलकर अपनी कल्पना से संवाद लिखिए और बातचीत को अभिनय द्वारा प्रस्तुत कीजिए।

🎭 चारों दृश्य

(क) "वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं। हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?" — नन्हीं-नन्हीं दो गौरैया क्या-क्या बोल रही होंगी?

(ख) "चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?" — घोंसले से झाँकती गौरैयाँ क्या-क्या बातें कर रही होंगी?

(ग) "एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं।" — जब उन्होंने पहली बार घर में प्रवेश किया तो उन्होंने आपस में क्या बातें की होंगी?

(घ) "उनके माँ-बाप झट से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे।" — गौरैयों और उनके बच्चों ने क्या-क्या बातें की होंगी?

बदली कहानी

CREATIVE WRITING

मान लीजिए कि घोंसले में अंडों से बच्चे न निकले होते। ऐसे में कहानी आगे कैसे बढ़ती? यह बदली हुई कहानी लिखिए — सोचिए, क्या पिताजी घोंसला तोड़ ही देते? गौरैयाँ कहाँ जातीं? माँ क्या कहतीं?

घर के प्राणी

कहानी में आपने पढ़ा कि लेखक के घर में अनेक प्राणी रहते थे। लेखक ने उनका वर्णन ऐसे किया है जैसे वे भी मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हैं। कहानी में से चुनकर उन प्राणियों की सूची बनाइए और बताइए कि वे मनुष्यों जैसे कौन-कौन से काम करते थे।

प्राणीमनुष्यों जैसा व्यवहार (कहानी से उदाहरण)
(क) बिल्ली'फिर आऊँगी' कहकर चली जाती है — (यह उदाहरण किताब में ही दिया गया है)
(ख) चूहेबूढ़ा चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है (जैसे उसे सर्दी लगती हो); दूसरा बाथरूम की टंकी पर बैठना पसंद करता है (जैसे उसे गरमी लगती हो)।
(ग) चमगादड़शाम पड़ते ही कमरों में आर-पार पर फैलाए कसरत करने लगते हैं — जैसे कोई व्यायाम कर रहा हो।
(घ) कबूतरदिन-भर 'गुटर-गूँ गुटर-गूँ' का संगीत सुनाते रहते हैं — जैसे कोई गाना गा रहा हो।
(ङ) गौरैयाँघर का 'निरीक्षण' करती हैं मानो घर खरीदने आई हों; बच्चा-गौरैयाँ चीं-चीं करके मानो अपना परिचय देती हैं, "हम आ गई हैं, हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?"

आपकी बात

इस कहानी की कुछ विशेषताएँ नीचे दी गई हैं। इनके उदाहरण कहानी में से चुनकर लिखिए (पहली पंक्ति किताब में पहले से भरी हुई है)।

कहानी की विशेषताएँकहानी में से उदाहरण
1. किसी बात को कल्पना से बढ़ा-चढ़ाकर कहनाजो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। (पहले से किताब में दिया गया उदाहरण)
2. हास्य यानी हँसी-मज़ाक का उपयोग किया जाना"चलो, दो तिनके तो निकल गए," माँ हँसकर बोलीं, "अब बाकी दो हज़ार भी निकल जाएँगे!"
3. सोचा कुछ और, हुआ कुछ औरपिताजी लाठी से घोंसला तोड़ने चले थे ताकि गौरैयाँ हमेशा के लिए चली जाएँ, पर इसके बदले बच्चा-गौरैयाँ निकल आईं और पिताजी का दिल पिघल गया — उन्होंने गौरैयों को अपना ही लिया।
4. दूसरों के मन के भावों का अनुमान लगाना"पिताजी कहने लगे कि मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं" — यहाँ लेखक/पिताजी गौरैयों के मन का अनुमान लगा रहे हैं।
5. किसी की कही बात को उसी के शब्दों में लिखना"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" माँ ने व्यंग्य से कहा — माँ के शब्द ज्यों के त्यों (उद्धरण चिह्नों में) लिखे गए हैं।
6. किसी प्राणी या उसके कार्य को कोई अन्य नाम देनागौरैयों के 'चीं-चीं' करने को "मल्हार गाना" कहा गया है — जैसे वे कोई शास्त्रीय राग गा रही हों।
7. किसने किससे कोई बात कही, यह सीधे-सीधे बताए बिना उस संवाद को लिखना"चलो, दो तिनके तो निकल गए" — इसके बाद सीधे "अब बाकी दो हज़ार भी निकल जाएँगे!" लिखा गया है, बिना दोहराए कि यह माँ ने ही कहा।

पाठ से आगे

यह आपके अपने अनुभव पर आधारित खुला प्रश्न है — अपने आस-पास के पक्षियों को ध्यान से देखकर लिखिए। जैसे: घर के बाहर कौवे आपस में लड़ते हुए दिखते हैं (गुस्सा), गौरैयाँ चूजों को खाना खिलाती हैं (प्यार/ममता)।

यह भी आपके अपने अनुभव पर आधारित प्रश्न है। जैसे: मैं अपना कमरा भाई-बहन के साथ साझा करता/करती हूँ। कभी-कभी झगड़ा होता है, पर हम बातचीत करके और बारी-बारी से चीज़ें इस्तेमाल करके समस्या सुलझा लेते हैं।

यह भी एक खुला, निजी अनुभव वाला प्रश्न है — ईमानदारी से अपना अनुभव लिखिए। जैसे: पहले मुझे किसी नए बच्चे से डर लगता था, पर उससे बात करने के बाद पता चला कि वह बहुत अच्छा दोस्त निकला और मेरी सोच बदल गई।

चिड़ियों का घोंसला

घोंसला बनाना चिड़ियों के जीवन का एक सामान्य हिस्सा है। विभिन्न पक्षी अलग-अलग तरह के घोंसले बनाते हैं। इन घोंसलों में वे अपने अंडे देते हैं और अपने चूजों को पालते हैं।

⚠️ सावधानी

अपने आस-पास घोंसले ढूँढ़िए और उन्हें ध्यान से देखिए — पर उन्हें हाथ न लगाएँ, अन्यथा पक्षियों, उनके अंडों और आपको भी खतरा हो सकता है।

क्रमघोंसले को कहाँ देखाकिन चीजों से बनाया गयाखाली था या नहींकिस पक्षी का था
1अपने घर के आस-पास घूमकर खुद भरिए — पेड़ों, छज्जों, रोशनदानों, एसी के पीछे देखिए!
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वाद-विवाद

कहानी में माँ द्वारा कही गई कुछ बातें: "अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं।" ... "एक दरवाजा खुला छोड़ो, बाकी दरवाजे बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।" ... "देखो जी, चिड़ियों को मत निकालो। अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब यहाँ से नहीं जाएँगी।"

🗣️ कक्षा गतिविधि

कक्षा में एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए। विषय है — "माँ चिड़ियों को घर से निकालना चाहती थीं।" कक्षा में आधे समूह इस कथन के पक्ष में और आधे समूह इसके विपक्ष में तर्क देंगे।

✍️ कहानी की रचना

"कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।" इस पंक्ति में बताया गया है कि पिताजी का दृष्टिकोण कैसे बदल गया। इस प्रकार यह एक विशेष वाक्य है — इस तरह के वाक्यों से कहानी और अधिक प्रभावशाली बन जाती है।

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जानकारी और मज़ा (Extra info & fun)

A little music, a little wordplay, and a fun puzzle — plus a real news story about sparrows!

मल्हार — किताब का नाम कहाँ से आया?

🎵 राग मल्हार

"जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं।"

मल्हार भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक प्रसिद्ध राग का नाम है। यह राग वर्षा ऋतु से जुड़ा है। आपकी हिंदी पाठ्यपुस्तक का नाम मल्हार भी इसी राग के नाम पर रखा गया है!

LISTEN & ENJOY

नीचे दी गई इंटरनेट कड़ियों के माध्यम से राग मल्हार को सुनिए और इसका आनंद लीजिए —

youtube.com/watch?v=3iQHe2hIJGM
youtube.com/watch?v=pHbXFAhQtpI
youtube.com/watch?v=7K3SYX8THkw

हास्य-व्यंग्य

😏 व्यंग्य क्या है?

"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" माँ ने व्यंग्य से कहा।

इस वाक्य में माँ ने पिताजी से सीधे यह नहीं कहा कि "आप गौरैयों को नहीं निकाल पाएँगे" — बल्कि घुमा-फिराकर, चूहों के उदाहरण से यही बात कह दी। इस तरह से कही गई बात को 'व्यंग्य करना' कहते हैं।

व्यंग्य का अर्थ होता है — हँसी-मज़ाक या उपहास के माध्यम से किसी कमी, बुराई या विडंबना को उजागर करना। व्यंग्य में बात को सीधे न कहकर उलटा या संकेतात्मक ढंग से कहा जाता है ताकि उसमें चुटकीलापन भी हो और गंभीर सोच की संभावना भी बनी रहे। अनेक बार व्यंग्य में हास्य भी छिपा होता है।

कुछ मज़ेदार वाक्य: "चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?" • "चलो, दो तिनके तो निकल गए... अब बाकी दो हज़ार भी निकल जाएँगे!" • "इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत थी। पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं।"

"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" — यह सबसे स्पष्ट व्यंग्य है, क्योंकि माँ घुमा-फिराकर पिताजी की असमर्थता की ओर इशारा कर रही हैं। "तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो" — यह भी व्यंग्य है, क्योंकि माँ पिताजी की 'समझदारी' पर उलटा ताना मार रही हैं।

आज की पहेली

🐱 चित्र-पहेली

किताब में एक चित्र-पहेली (maze) दी गई है, जिसमें बिल्ली को चूहे तक पहुँचाना है — घुमावदार रास्तों से होते हुए! अगर आपके पास किताब है, तो पेज 27 पर यह पहेली खुद करके देखिए। यह सिर्फ एक मज़ेदार गतिविधि है, इसमें कोई सही/गलत जवाब नहीं है।

झरोखे से — विश्व गौरैया दिवस

'दो गौरैया' कहानी में आपने पढ़ा कि दो गौरैया लेखक के घर में बिन बुलाए अतिथि की तरह आ जाती हैं। पिछले कई वर्षों से गाँव-नगरों में इन नन्हीं चिड़ियों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। इसलिए भारत सरकार ने इनके संरक्षण के लिए 20 मार्च को 'विश्व गौरैया दिवस' घोषित किया है। आइए, पढ़ते हैं 'विश्व गौरैया दिवस' पर प्रेस सूचना ब्यूरो द्वारा प्रकाशित लेख का एक अंश—

📰 विश्व गौरैया दिवस · 20 मार्च

कभी बहुतायत में पाई जाने वाली घरेलू गौरैया अब कई जगहों पर एक दुर्लभ दृश्य और रहस्य बन गई है। इन छोटे प्राणियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उनकी रक्षा करने के लिए, हर साल 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाया जाता है।

भारत में गौरैया सिर्फ़ पक्षी नहीं हैं; वे साझा इतिहास और संस्कृति का प्रतीक हैं। हिंदी में "गौरैया", तमिल में "कुरुवी" और उर्दू में "चिरिया" जैसे कई नामों से जानी जाने वाली गौरैया पीढ़ियों से दैनिक जीवन का हिस्सा रही हैं।

उनकी महत्ता के बावजूद, गौरैया तेजी से लुप्त हो रही हैं। इस गिरावट के कई कारण हैं। सीसा रहित पेट्रोल के उपयोग से जहरीले यौगिक पैदा हुए हैं जो उन कीटों को नुकसान पहुँचाते हैं, जिन पर गौरैया भोजन के लिए निर्भर हैं। शहरीकरण ने उनके प्राकृतिक घोंसले के स्थान भी छीन लिए हैं — आधुनिक इमारतों में वे स्थान नहीं होते जहाँ गौरैया घोंसला बना सकें, जिससे उनके बच्चों को पालने के लिए जगह कम हो गई है।

— साभार: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (भारत सरकार)

साझी समझ

नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी का प्रयोग कर इस लेख को पूरा पढ़िए और कक्षा में चर्चा कीजिए —
pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID=2112370

7

मित्रलाभ (Panchatantra story)

A bonus Panchatantra fable about four animal friends — a crow, a tortoise, a mouse, and a deer — who save each other from a hunter through friendship!
📖 The story, step by step
1
A crow named लघुपतनक warns forest birds not to eat grain scattered by a hunter (व्याध) as bait. A pigeon king, चित्रग्रीव, ignores the warning and his whole flock gets trapped in a net.
2
Chitragriva tells his pigeons to fly off together, net and all — they escape as one. The crow follows them to see where they go.
3
They reach a mouse named हिरण्यक, who gnaws through the net — but insists on freeing the other pigeons FIRST, since Chitragriva is their leader and should think of them before himself.
4
Impressed, the crow befriends the mouse. Later they meet a tortoise, मन्थरक, and a deer, चित्रांग, fleeing the same hunter — the four become close friends.
5
One day the deer is caught in the hunter's net. The mouse gnaws it free, but the hunter then captures the tortoise instead!
6
The clever crow devises a plan: the deer pretends to be dead by the water; the crow pecks at it to look convincing. The hunter, tempted, drops the tortoise to grab the "dead" deer — and the mouse instantly frees the tortoise!
All four friends escape safely, saved entirely by the power of friendship. "मित्रता में बड़ी शक्‍ति है। हमें अपने मित्रों की सहायता के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।"
✨ Where this story is from

This story comes from the पंचतंत्र (Panchatantra) — an ancient Indian book still read worldwide for both entertainment and moral lessons.

8

Practice like the real exam

Cover the answer, try it yourself first, then tap to check!

MCQ style (1 mark each)

(ख) भीष्म साहनी

Short answer (2 marks)

मन्थरक (कछुआ) खुद जाल में फँसा था। उसे बचाने के लिए लघुपतनक (कौआ) ने एक योजना बनाई — चित्रांग (हिरन) मरा हुआ बना, कौआ उसे चोंच मारता रहा, हुनर को धोखा देकर हिरण्यक ने मन्थरक के बंधन काट दिए।

Longer answer (3-4 marks)

पूरी कहानी में पिताजी बार-बार गौरैयों को घर से निकालने की कोशिश करते रहते हैं और उनके घोंसले को भी तोड़ने की योजना बनाते हैं। लेकिन जब घोंसला तोड़ते समय अचानक दो नन्हीं बच्चा-गौरैयाँ चीं-चीं करके निकल आती हैं, तो पिताजी का दिल पिघल जाता है। वह चुपचाप लाठी एक ओर रख देते हैं, और कहानी के अंत में शोर मचने पर भी वह गुस्सा होने की बजाय सिर्फ मुस्कुराते रहते हैं।

9

You did it! 🎉

Chapter 2 done! A funny family story, ALL the official textbook activities, a raga, a bit of grammar, and a Panchatantra fable about friendship. ⭐
Full story क्रिया विशेषण मेरी समझ से (official) सोच-विचार / कल्पना राग मल्हार व्यंग्य विश्व गौरैया दिवस मित्रलाभ (Panchatantra) 4 animal friends

🏁 Chapter 2 · Term 1 Hindi · Prishita, Class 8